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क्या ग्लूकोमा केवल बुजुर्गों को ही होता है? जानिए पूरी सच्चाई

  • Aug 1
  • 6 min read
 क्या ग्लूकोमा केवल बुजुर्गों को ही होता है? जानिए पूरी सच्चाई

ग्लूकोमा (Glaucoma) आंखों की सबसे गंभीर बीमारियों में से एक है, लेकिन दुर्भाग्य से इसके बारे में लोगों के बीच आज भी कई गलत धारणाएं मौजूद हैं। सबसे आम मिथकों में से एक यह है कि ग्लूकोमा केवल बुजुर्गों को ही होता है। इसी गलतफहमी के कारण कई युवा और मध्यम आयु वर्ग के लोग अपनी आंखों की नियमित जांच नहीं करवाते। जब तक उन्हें समस्या का एहसास होता है, तब तक आंखों की ऑप्टिक नर्व को काफी नुकसान पहुंच चुका होता है और खोई हुई दृष्टि को वापस लाना संभव नहीं रहता। यही कारण है कि ग्लूकोमा को "साइलेंट थीफ ऑफ साइट" यानी "दृष्टि का मौन चोर" भी कहा जाता है। वास्तविकता यह है कि ग्लूकोमा किसी भी उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है। नवजात शिशुओं से लेकर बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों तक, हर आयु वर्ग में इसके मामले देखने को मिलते हैं। हालांकि बढ़ती उम्र के साथ इसका खतरा बढ़ जाता है, लेकिन केवल उम्र के आधार पर किसी व्यक्ति को सुरक्षित मान लेना बिल्कुल सही नहीं है। यदि किसी व्यक्ति में जोखिम कारक मौजूद हैं, तो कम उम्र में भी ग्लूकोमा विकसित हो सकता है। इसलिए इस बीमारी के बारे में सही जानकारी होना और समय-समय पर आंखों की जांच कराना बेहद आवश्यक है।



क्या वास्तव में ग्लूकोमा केवल बुजुर्गों की बीमारी है?

यह धारणा काफी समय से लोगों के बीच बनी हुई है कि ग्लूकोमा केवल 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों को होता है। ऐसा इसलिए भी माना जाता है क्योंकि अधिकांश मामलों का पता इसी आयु वर्ग में चलता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि युवा या बच्चे इस बीमारी से पूरी तरह सुरक्षित हैं। चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट रूप से बताता है कि ग्लूकोमा का संबंध केवल उम्र से नहीं बल्कि कई अन्य कारणों से भी होता है। आज के समय में बदलती जीवनशैली, बढ़ता स्क्रीन टाइम, मधुमेह, आंखों की चोट, लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं का उपयोग और आनुवंशिक कारणों के चलते कम उम्र में भी ग्लूकोमा के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। कई बार मरीज को कोई स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते और बीमारी वर्षों तक धीरे-धीरे आंख की नस को नुकसान पहुंचाती रहती है। यही वजह है कि केवल उम्र के भरोसे रहना आंखों के लिए जोखिम भरा हो सकता है।



ग्लूकोमा क्या है और यह आंखों को कैसे प्रभावित करता है?

ग्लूकोमा एक ऐसी आंखों की बीमारी है जिसमें ऑप्टिक नर्व धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होने लगती है। यही नस आंखों से प्राप्त दृश्य जानकारी को मस्तिष्क तक पहुंचाने का कार्य करती है। जब यह नस प्रभावित होती है तो सबसे पहले व्यक्ति की साइड विजन यानी परिधीय दृष्टि कम होने लगती है। यदि समय पर इलाज न मिले तो धीरे-धीरे केंद्रीय दृष्टि भी प्रभावित हो सकती है और अंततः स्थायी अंधापन हो सकता है। बहुत से लोग मानते हैं कि ग्लूकोमा केवल आंखों का दबाव बढ़ने से होता है, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। कई मरीजों में आंखों का दबाव सामान्य रहने के बावजूद भी ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए केवल आंखों का प्रेशर सामान्य होना यह साबित नहीं करता कि व्यक्ति को ग्लूकोमा नहीं है। सही जांच के लिए ऑप्टिक नर्व, विजुअल फील्ड और अन्य आधुनिक परीक्षण भी आवश्यक होते हैं।



कम उम्र में ग्लूकोमा होने के प्रमुख कारण

यदि किसी व्यक्ति के परिवार में पहले से ग्लूकोमा का इतिहास है, तो उसके लिए जोखिम सामान्य लोगों की तुलना में कहीं अधिक हो सकता है। यदि माता-पिता, भाई-बहन या दादा-दादी में किसी को ग्लूकोमा रहा है, तो परिवार के अन्य सदस्यों को नियमित नेत्र परीक्षण करवाना चाहिए। कई मामलों में यह बीमारी आनुवंशिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ सकती है। आंखों में गंभीर चोट लगने के बाद भी कई वर्षों तक ग्लूकोमा विकसित होने का खतरा बना रहता है। खेलकूद, सड़क दुर्घटनाओं या औद्योगिक दुर्घटनाओं के दौरान लगी चोट भविष्य में आंखों के अंदर होने वाले बदलावों का कारण बन सकती है। इसके अलावा बिना चिकित्सकीय सलाह के लंबे समय तक स्टेरॉयड आई ड्रॉप्स या स्टेरॉयड दवाओं का उपयोग भी आंखों के दबाव को बढ़ा सकता है और ग्लूकोमा के जोखिम को बढ़ा देता है। मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अत्यधिक मायोपिया (High Myopia) जैसी स्थितियां भी आंखों की नसों पर प्रभाव डाल सकती हैं। ऐसे लोगों को सामान्य व्यक्ति की तुलना में अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता होती है। आधुनिक जीवनशैली में लंबे समय तक स्क्रीन देखने से सीधे ग्लूकोमा नहीं होता, लेकिन यदि पहले से जोखिम मौजूद है तो नियमित जांच को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।



क्या बच्चों को भी ग्लूकोमा हो सकता है?

बहुत से लोगों को यह जानकर आश्चर्य होता है कि ग्लूकोमा जन्म के समय भी हो सकता है। इसे जन्मजात ग्लूकोमा (Congenital Glaucoma) कहा जाता है। इस स्थिति में बच्चे की आंखों के विकास में समस्या होती है, जिसके कारण आंखों का दबाव बढ़ जाता है और ऑप्टिक नर्व प्रभावित होने लगती है। बच्चों में यह बीमारी वयस्कों की तुलना में अलग प्रकार से दिखाई देती है। यदि बच्चे की आंखों से लगातार पानी आता है, तेज रोशनी में परेशानी होती है, आंख सामान्य से बड़ी दिखाई देती है या कॉर्निया धुंधला नजर आता है, तो इसे सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर उपचार मिलने पर बच्चे की दृष्टि को काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है।



ग्लूकोमा के शुरुआती लक्षण क्यों आसानी से समझ नहीं आते?

ग्लूकोमा की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इसके शुरुआती चरण में अधिकांश मरीजों को कोई परेशानी महसूस नहीं होती। व्यक्ति सामान्य रूप से पढ़ता-लिखता रहता है और उसे लगता है कि उसकी आंखें पूरी तरह स्वस्थ हैं। लेकिन इसी दौरान ऑप्टिक नर्व धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होती रहती है। जब बीमारी बढ़ने लगती है तो साइड विजन कम होने लगती है, लेकिन हमारा मस्तिष्क दूसरी आंख की सहायता से इसकी भरपाई करता रहता है। इसलिए मरीज को काफी देर तक इस बदलाव का एहसास नहीं होता। कुछ विशेष प्रकार के ग्लूकोमा में आंखों में तेज दर्द, सिरदर्द, धुंधला दिखाई देना, रोशनी के चारों ओर रंगीन घेरे दिखना, आंखों का लाल होना तथा मतली जैसी समस्याएं अचानक उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसी स्थिति एक मेडिकल इमरजेंसी मानी जाती है और तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से संपर्क करना आवश्यक होता है।



ग्लूकोमा की पहचान कैसे की जाती है?

सामान्य आई टेस्ट या केवल चश्मे का नंबर जांचना ग्लूकोमा का पता लगाने के लिए पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए व्यापक नेत्र परीक्षण की आवश्यकता होती है। नेत्र विशेषज्ञ आंखों के अंदर का दबाव मापते हैं, ऑप्टिक नर्व की स्थिति का मूल्यांकन करते हैं, विजुअल फील्ड टेस्ट के माध्यम से दृष्टि के दायरे की जांच करते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर OCT स्कैन जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग करते हैं। इन सभी जांचों का उद्देश्य केवल बीमारी की पहचान करना ही नहीं बल्कि यह समझना भी होता है कि ऑप्टिक नर्व को कितना नुकसान पहुंच चुका है और उपचार किस प्रकार किया जाना चाहिए। जितनी जल्दी बीमारी का पता चलता है, दृष्टि को सुरक्षित रखने की संभावना उतनी ही अधिक होती है।



क्या ग्लूकोमा का इलाज संभव है?

ग्लूकोमा से क्षतिग्रस्त हो चुकी ऑप्टिक नर्व को पूरी तरह ठीक करना वर्तमान चिकित्सा विज्ञान के लिए संभव नहीं है। इसलिए इसका सबसे महत्वपूर्ण उपचार समय पर पहचान और बीमारी को आगे बढ़ने से रोकना है। यदि शुरुआती अवस्था में इसका पता चल जाए तो आई ड्रॉप्स, लेजर उपचार या आवश्यकता पड़ने पर सर्जरी के माध्यम से आंखों के दबाव को नियंत्रित किया जा सकता है और दृष्टि को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इसलिए मरीज को डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं का नियमित रूप से उपयोग करना चाहिए और बिना सलाह के उपचार बंद नहीं करना चाहिए। कई लोग आंखों का दबाव सामान्य होते ही दवाएं बंद कर देते हैं, जिससे बीमारी दोबारा तेजी से बढ़ सकती है।



नियमित आंखों की जांच क्यों सबसे बड़ा बचाव है?

ग्लूकोमा से बचने का सबसे प्रभावी तरीका नियमित नेत्र परीक्षण है। यदि आपकी उम्र 40 वर्ष से अधिक है, परिवार में किसी को ग्लूकोमा है, आपको डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर है, या आपने लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं का उपयोग किया है, तो आपको नियमित रूप से व्यापक आंखों की जांच अवश्य करवानी चाहिए। हालांकि जिन लोगों में कोई विशेष जोखिम नहीं है, उन्हें भी समय-समय पर नेत्र विशेषज्ञ से आंखों की जांच करानी चाहिए क्योंकि कई बार बीमारी बिना किसी चेतावनी के विकसित होती रहती है। आंखों की नियमित जांच केवल ग्लूकोमा ही नहीं बल्कि मोतियाबिंद, रेटिना संबंधी समस्याओं और अन्य गंभीर नेत्र रोगों का भी शुरुआती चरण में पता लगाने में मदद करती है। इससे समय पर उपचार संभव हो जाता है और दृष्टि सुरक्षित रहती है।




निष्कर्ष

"ग्लूकोमा केवल बुजुर्गों को ही होता है" पूरी तरह एक मिथक है। सच यह है कि यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है। हालांकि बढ़ती उम्र के साथ इसका जोखिम बढ़ जाता है, लेकिन आनुवंशिक कारण, आंखों की चोट, मधुमेह, स्टेरॉयड का लंबे समय तक उपयोग और कुछ अन्य स्वास्थ्य स्थितियां युवाओं तथा बच्चों में भी ग्लूकोमा का कारण बन सकती हैं। ग्लूकोमा की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके शुरुआती चरण में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। इसलिए केवल लक्षणों का इंतजार करना सही नहीं है। नियमित नेत्र परीक्षण, समय पर निदान और विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार उपचार ही आंखों की रोशनी को जीवनभर सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी तरीका है। यदि आप अपनी दृष्टि को स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो इस मिथक पर विश्वास करने के बजाय नियमित आंखों की जांच को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाइए। यही छोटी-सी आदत भविष्य में आपकी अनमोल दृष्टि को सुरक्षित रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभा सकती है।

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