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तनाव के कारण आंखों में दिखाई देने वाले सामान्य लक्षण

  • Jul 24
  • 5 min read

Updated: Jul 27

तनाव के कारण आंखों में दिखाई देने वाले सामान्य लक्षण

मानसिक तनाव का प्रभाव केवल मन और व्यवहार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह शरीर के लगभग हर अंग को प्रभावित कर सकता है और आंखें भी इससे अछूती नहीं रहतीं। जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक तनाव, चिंता या अत्यधिक मानसिक दबाव में रहता है, तो शरीर में कोर्टिसोल (Cortisol) और एड्रेनालिन (Adrenaline) जैसे तनाव हार्मोन का स्तर सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। ये हार्मोन शरीर को आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए तैयार करते हैं, लेकिन यदि इनका स्तर लंबे समय तक ऊंचा बना रहे तो यह आंखों की मांसपेशियों, रक्त संचार और तंत्रिका तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति को धुंधला दिखाई देना, आंखों में भारीपन, आंखों का जल्दी थक जाना, सूखापन, जलन, पलक फड़कना, सिरदर्द और तेज रोशनी में असहजता जैसे लक्षण महसूस हो सकते हैं। कई बार लोगों को ऐसा लगता है कि उनकी आंखों की रोशनी कमजोर हो रही है, जबकि वास्तविक समस्या तनाव और आंखों की थकान होती है। यदि व्यक्ति लंबे समय तक कंप्यूटर, मोबाइल या लैपटॉप का उपयोग करता है, तो तनाव और डिजिटल आई स्ट्रेन मिलकर इन लक्षणों को और अधिक गंभीर बना सकते हैं। इसके अलावा तनाव के कारण नींद पूरी न होना, अनियमित खान-पान और पानी कम पीना भी आंखों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है। यही वजह है कि लगातार तनाव में रहने वाले लोगों को आंखों में जलन, सूखापन और फोकस करने में कठिनाई की शिकायत अधिक होती है। यदि इन संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए और तनाव को नियंत्रित करने के साथ-साथ आंखों की नियमित देखभाल की जाए, तो अधिकांश समस्याओं से बचा जा सकता है। लेकिन यदि लक्षण लगातार बने रहें, बार-बार लौटकर आएं या अचानक दृष्टि में परिवर्तन महसूस हो, तो बिना देरी किए नेत्र विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए ताकि किसी गंभीर बीमारी का समय रहते पता लगाया जा सके।



आंखों में थकान

आंखों में थकान, जिसे मेडिकल भाषा में Eye Fatigue या Asthenopia कहा जाता है, आज के डिजिटल युग की सबसे आम समस्याओं में से एक है। तनाव के साथ इसका संबंध काफी गहरा माना जाता है क्योंकि मानसिक दबाव के दौरान व्यक्ति की आंखें और मस्तिष्क लगातार अधिक मेहनत करते हैं। जब कोई व्यक्ति घंटों तक कंप्यूटर स्क्रीन, मोबाइल फोन या लैपटॉप पर काम करता है, तब उसकी आंखों की मांसपेशियां लगातार फोकस बनाए रखने का प्रयास करती रहती हैं। यदि इसके साथ तनाव, समय सीमा का दबाव और पर्याप्त नींद की कमी भी जुड़ जाए, तो आंखों की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है। व्यक्ति को ऐसा महसूस हो सकता है कि आंखें भारी हो गई हैं, बार-बार आंखें बंद करने का मन करता है, पढ़ने में ध्यान नहीं लगता और लंबे समय तक किसी वस्तु पर फोकस बनाए रखना कठिन हो जाता है। कई लोगों को आंखों के आसपास हल्का दर्द, माथे में दबाव या सिरदर्द भी महसूस होने लगता है। दिनभर की थकान के बाद आंखों में जलन, पानी आना या सूखापन भी हो सकता है। यह स्थिति केवल काम की उत्पादकता को ही नहीं घटाती, बल्कि जीवन की गुणवत्ता को भी प्रभावित करती है। यदि समय रहते आराम न किया जाए, तो यह समस्या धीरे-धीरे डिजिटल आई स्ट्रेन में बदल सकती है। इससे बचने के लिए 20-20-20 नियम अपनाना, हर घंटे कुछ मिनट का ब्रेक लेना, स्क्रीन की उचित दूरी बनाए रखना, पर्याप्त रोशनी में काम करना, नियमित रूप से पलक झपकाना और सात से आठ घंटे की अच्छी नींद लेना अत्यंत आवश्यक है। यदि इन उपायों के बावजूद आंखों की थकान लगातार बनी रहती है, तो यह दृष्टि दोष, ड्राई आई सिंड्रोम या किसी अन्य नेत्र रोग का संकेत हो सकता है। ऐसे में स्वयं इलाज करने की बजाय नेत्र विशेषज्ञ से संपूर्ण आंखों की जांच कराना सबसे उचित कदम होता है।



सूखी आंखें

ड्राई आई सिंड्रोम या आंखों का सूखापन केवल उम्र बढ़ने की समस्या नहीं है, बल्कि आज के समय में यह युवाओं और ऑफिस में लंबे समय तक काम करने वाले लोगों में भी तेजी से बढ़ रहा है। तनाव इस समस्या को बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण कारणों में से एक माना जाता है। जब व्यक्ति मानसिक दबाव में होता है, तो वह अनजाने में सामान्य से कम पलक झपकाता है, विशेष रूप से तब जब वह लगातार मोबाइल, लैपटॉप या कंप्यूटर स्क्रीन पर काम कर रहा हो। सामान्य परिस्थितियों में पलक झपकाने से आंखों की सतह पर आंसुओं की एक समान परत बनती रहती है, जो आंखों को नम, साफ और सुरक्षित रखती है। लेकिन तनाव और लंबे स्क्रीन टाइम के कारण यह प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है, जिससे आंखों की नमी कम होने लगती है। इसके परिणामस्वरूप आंखों में जलन, खुजली, चुभन, लालपन, भारीपन और रेत जैसा महसूस होना शुरू हो जाता है। कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि आंखों में कोई धूल का कण फंस गया है, जबकि वास्तव में यह ड्राई आई का लक्षण होता है। यदि इस स्थिति का समय पर उपचार न किया जाए, तो पढ़ने, वाहन चलाने, टीवी देखने और कंप्यूटर पर लंबे समय तक काम करने में कठिनाई हो सकती है। लगातार सूखी आंखें रहने से आंखों में संक्रमण का खतरा भी बढ़ सकता है और कॉर्निया को नुकसान पहुंचने की संभावना भी रहती है। इस समस्या से बचने के लिए पर्याप्त पानी पीना, कमरे की नमी बनाए रखना, एयर कंडीशनर की सीधी हवा से बचना, डॉक्टर की सलाह के अनुसार आर्टिफिशियल टीयर्स का उपयोग करना और स्क्रीन के सामने नियमित अंतराल पर ब्रेक लेना बहुत जरूरी है। साथ ही तनाव को नियंत्रित करने के लिए योग, ध्यान और पर्याप्त नींद को अपनी दिनचर्या में शामिल करना भी आंखों की नमी बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।



किन लोगों में तनाव के कारण आंखों की समस्या अधिक होती है?

हालांकि तनाव किसी भी उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है, लेकिन कुछ लोगों में इसका प्रभाव आंखों पर अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिलता है। आज के डिजिटल दौर में अधिकांश लोग अपने काम, पढ़ाई या मनोरंजन के लिए घंटों तक स्क्रीन का उपयोग करते हैं। ऐसे लोगों की आंखों पर लगातार फोकस बनाए रखने का दबाव रहता है, जिससे तनाव का असर और अधिक बढ़ जाता है। विशेष रूप से आईटी प्रोफेशनल, सॉफ्टवेयर इंजीनियर, बैंक कर्मचारी, कंटेंट राइटर, डिजिटल मार्केटर, ग्राफिक डिजाइनर, वीडियो एडिटर, कॉल सेंटर कर्मचारी और ऑनलाइन पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी इस समस्या के अधिक शिकार हो सकते हैं। इसके अलावा डॉक्टर, शिक्षक, चार्टर्ड अकाउंटेंट और वे लोग जो लंबे समय तक सूक्ष्म कार्य करते हैं, उनकी आंखों पर भी अधिक दबाव पड़ता है। जिन लोगों को पहले से माइग्रेन, ड्राई आई सिंड्रोम, ग्लूकोमा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप या किसी प्रकार का दृष्टि दोष है, उनमें तनाव आंखों की समस्याओं को और अधिक बढ़ा सकता है। वरिष्ठ नागरिकों में भी तनाव और बढ़ती उम्र का संयुक्त प्रभाव आंखों की कार्यक्षमता पर पड़ सकता है। यदि परिवार में ग्लूकोमा या रेटिना संबंधी रोगों का इतिहास है, तो नियमित नेत्र जांच और भी आवश्यक हो जाती है। इसलिए जोखिम वाले सभी लोगों को केवल तनाव कम करने पर ही नहीं, बल्कि आंखों की नियमित जांच, संतुलित आहार, पर्याप्त पानी, अच्छी नींद और स्वस्थ जीवनशैली पर भी ध्यान देना चाहिए। ऐसा करने से न केवल आंखों की कार्यक्षमता लंबे समय तक बेहतर बनी रहती है, बल्कि गंभीर नेत्र रोगों के जोखिम को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।


अधिक जानकारी के लिए इस नंबर पर संपर्क करें: 96 25 903017


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